बचपन का वह पहला प्यार

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बचपन का वह पहला प्यार
आज सालो बाद फिर याद आ गया ,
चेहरे पे मुस्कान
अनोखी सी सजा गया|

वह क्लासरूम की नोकझोक,
वह कैंटीन की मौज मस्ती,
वह बात बात पे मुह फुलाना
फिर पल भर में सब भुलाना|

वह ज़माना तो न था
whatsapp और snapchat का,
लेकिन मज़ा था जो
आँख चुराने में
वह बतलाने में कहाँ था|

बात है यह काफी पुरानी,
दुनिया जहान बदल गए अब,
लेकिन दिल में है ताज़ा
आज भी वही अधूरी हसरत|

जो आई आज वह मीठी याद
लो उसी की खातिर,
माँगती हूँ मैं
एक बार फिर|

ऐ ज़िन्दगी !
ला खड़ा करना दोबारा,
उस रास्ते के मुसाफिर को
मेरे रूबरू,
न जाने दूंगी इस बार उसे
अपने से कहीं दूर|

और अगर,
आया भी कभी
जुदा होने का वक़्त,
तो बात इस दिल की
पंहुचा दूंगी
उस अनजान दिल तक
ज़रूर|

तभी आएगा सुकून मुझे
जब वाकिफ होगा वह
मेरी मोहब्बत से,
जो रहा आज तक बेखबर
मेरे हाल -ए -दिल से |

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2 thoughts on “बचपन का वह पहला प्यार

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