छोटी सी मुलाकात, बड़ी सी बात|

“वह शायद इसके अतिरिक्त मेरे बारे में कुछ नहीं जानते थे कि मैं अपने पापा की बेटी हूँ, और न ही मैं उनको अपने पिता के दोस्त होने के अलावा जानती थी, लेकिन आज उन्होने जो बात मुझसे कही, उसकी आवश्यकता मुझे बिल्कुल इसी समय में थी, यह पता नहीं उन्हें कैसे पता था|”

अकर्म, अपेक्षा और सात्विक ईगो- आज दोपहर से यह शब्द मेरे कानो में कुछ इस प्रकार गूँज रहें हैं कि इन्होने मेरे मन में घर कर लिया है| सुन कर मन में एक नया उल्लास जाग उठा| प्रसन्नता का कोई खास अवसर तो नही था, परंतु एक बहुत ही महत्वपूर्ण सत्य को इतनी खूबसूरती एवं सरलता से जान पाने की खुशकिस्मती आज मुझे प्राप्त हुई|

वह कह रहे थे, ” माँगो तो ईश्वर से यह माँगो कि हमें कभी कुछ माँगने की ज़रूरत ही न पड़े| इस स्थिति की खूबसूरती इस बात में झलकती है कि ह्म माँगते तभी हैं जब हमें किसी चीज़ की चाह हो, किसी कर्म के फल स्वरूप| अकर्मी को कभी किसी चीज़ की अपेक्षा नहीं होती| दुख का कारण होता है अपेक्षा, अपेक्षा रहित जीवन जो व्यक्ति व्यतीत करता है, उसे दुख किस प्रकार छूएगा|
जीवन में भले ही मनुष्य सब कुछ छोड़ दे, किसी चीज़ की अपेक्षा ना रखे, फिर भी एक चीज़ ऐसी होती है, जिसको वह लाख कोशिशों के बावजूद छोड़ नहीं सकता- यह है उसकी सात्विक ईगो| उदाहरण स्वरूप- एक बेहतरीन पर्फॉर्मेन्स देने के बाद, तालियो द्वारा आपकी तारीफ़ होना- एक आश्वासन मिलना कि हम किसी को लुभाने में सफल हुए हैं- इस से अपने आप को दूर रख पाना कठिन होता है| कलाकार कितना भी संतुष्ट हो, परंतु जब तक तारीफ नही सुनता बेचैन रहता है|”

आज उनकी बातें सुनने का मुझे दूसरा अवसर प्राप्त हुआ| मुझे याद है, पहली बार मैं जब उनसे मिली थी तब थोड़ी हैरान थोड़ी परेशान थी| दिल टूटना किसे कहते हैं, इस बात से तब मैं पहली बार परिचित हुई थी| किसी बहुत ही प्रिय चीज़ से हुआ लगाव, उस चीज़ के गुम हो जाने के बाद, सता रहा था मुझे|

“मैं बस अपने वर्तमान से भागना चाहती हूँ, यह कहकर पापा को बोला, यहाँ से कहीं दूर चलो|” इसी दौरान इन अंकल से मुलाकात हुई थी| हम उनके ड्रॉयिंग रूम में बैठे हुए थे| वह कहने लगे, ” हम ऐसे प्राणी हैं, जिन्हे मोह बड़े ही कम समय में हो जाता है| एक ऐसा लगाव- छोटी से बड़ी वस्तु से, जाने अंजाने व्यक्तियों से हो जाता है| न नौकरी से, न किसी व्यक्ति से और न ही किसी संबंध से, मोह करना चाहिए| हमेशा एक बात का स्मरण रखना कि ज़िंदगी रुकती नहीं है, चलती रहती है| अगर एक दरवाज़ा बंद हो गया हो, तो उसे देख कर हतोत्साहित होने कि बजाए, दूसरे दरवाज़े की ओर जाओ| नौकरी बदलती रहेगी, शहर बदलते रहेंगे, कुछ लोग मिलेंगे, कुछ बिछड़ जाएँगे- हमें यह सब स्वीकार करके आगे बढ़ना है; मायूस नहीं होना|”

किस सन्दर्भ में वह यह कह रहे थे, मैने शायद उस पर गौर नहीं फरमाया था, परंतु उनकी इस बात को मैने अपने दिल ओ दिमाग में कुछ ऐसे गाँठ बाँध ली, कि अब अपने हृदय एवं मस्तिष्क में एक ऐसी शांति को अनुभव करती हू, कि सदा उनकी आभारी रहूंगी|

कुछ साल पहले, मेरे पापा ने मुझसे एक छोटी से बात कही थी कि जब भी किसी बड़े से मिलना, तो बजाए सिर्फ़ सिर हिला के हेलो करने के, दोनो हाथ जोड़कर नमस्ते करना, अच्छा लगता है| उन्होने बोला और मैं वैसे ही करने लगी| कभी सामने वाले के सम्मान के लिए तो कभी पापा की खुशी के लिए| लेकिन इसके सही महत्व का मुझे, कुछ ही दिन पहले आभास हुआ जब मैने एक किताब में पढ़ा कि हाथ जोड़ने से तात्पर्य होता है की “आपकी और मेरी आत्मा एक ही है|”

आज सुबेह वह मान्यवर मेरे घर आए| वह शायद इसके अतिरिक्त मेरे बारे में कुछ नहीं जानते थे कि मैं अपने पापा कि बेटी हूँ, और ना ही मैं उनको अपने पिता के दोस्त होने के अलावा जानती थी, लेकिन आज उन्होने जो बात मुझसे कही, उसकी आवश्यकता मुझे बिल्कुल इसी समय में थी, यह पता नहीं उन्हें कैसे पता था| जब वह जाने लगे तो मैने अपने दोनो हाथ जोड़कर, एक आखरी बार जब उन्हे नमस्ते किया तो उनकी आँखो में तेज और हृदय में स्नेह देख कर ऐसा प्रतीत हुआ कि किस प्रकार उनकी और मेरी आत्मा एक ही थी|

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